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झारखंड की चित्रकला

संताल जनजाति में चित्रांकन की एक लोककला काफी मशहूर रही है। अब यह कला लुप्तप्राय है। उसका नाम है - जादोपटिया शैली। संथाल समाज के मिथकों पर आधारित इस लोककला में समाज के विभिन्न रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों और नैतिक मान्यताओं की प्रस्तुति की जाती है। उन चित्रों की रचना करने वाले को संताली भाषा में जादो कहा जाता है। यह कला पहले वंशानुगत हुआ करती थी। इस शैली में सामान्यत: छोटे कपड़ों या कागज के टुकड़ों को जोड़कर बनाये जाने वाले पटों पर चित्र अंकित किये जाते हैं। प्रत्येक पट 15 से 20 फीट चौड़ा होता है। इन पर चार से सोलह चित्र तक बनाये जाते हैं। चित्रों में मुख्यत: लाल, हरा, पीला, भूरा और काले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे, जंगल, झरनों और पहाड़ों के बीच बसने वाले आदिवासियों का जीवन प्रकृति के सहज सौंदर्य से प्रेरित होता है। उनका सौंदर्य बोध उनके घरों की सजावट में प्रतिबिंबित होता है। आम तौर पर साफ-सुथरे घरों की दीवारों पर चिकनी मिट्टी का लेप और मिट्टी व वनस्पति से प्राप्त रंगों से उकेरी जाने वाली आकर्षक आकृतियां आदिवासी समाज के सहज-सरल जीवन में निहित कला और सौंदर्यबोध का प्रमाण हैं।

संताली चित्रकला के अध्येता युवा चित्रकार शेखर के अनुसार 'संताल आदिवासियों में भित्ति चित्र की परंपरा काफी समृध्द और प्राचीन रही है। इनके मिथकों, अलंकरण और सज्जाकारी में गजब का मानवीय बोध दिखता है। संताल आदिवासी अपने भित्ति चित्रण के इतिहास में अपनी प्राचीन स्थली चाय-चम्पा गढ़ का जिक्र करते हैं। चाय-चम्पा को वे आधुनिक संदर्भ में सिंधु घाटी की सभ्यता से जोड़ते हैं। इनका मानना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता इन्हीं की सभ्यता है। संताली मान्यताओं के अनुसार चाय-चाम्पा के किले में चित्रकला के उत्कृष्ट नमूने चित्रित थे।'

'आदिवासी जीवन के उमंग के प्रतीक संताली भित्ति चित्र' (15 नवंबर, 2002, 'प्रभात खबर', रांची) में संताली कला-दृष्टि का विश्लेषण करते हुए शेखर कहते हैं - ''संताल आदिवासी जब अपना नया घर बनाते हैं, उसी समय तय किया जाता है कि दीवार तथा दरवाजों को किन-किन आकृतियों तथा डिजाइनों से सजाया जाये। 'उभार' वाले चित्र के लिये डिजाइन के अनुरूप कच्ची दीवार पर खुरपी, करनी तथा अन्य सहायक उपकरणों की मदद से मिट्टी को काट कर आकृति को उभारा जाता है। यह विधि संथाल परगना में काफी प्रचलित हैं। छोटानागपुर में प्राय: चित्र समतल बनाये जाते हैं। दीवार की सतह पर सफेद खड़िया की सहायता से डिजाइन बनाया जाता है, फिर रंग भरा जाता है।

दीवार-चित्रण में प्राय: मिट्टी रंग का ही प्रयोग किया जाता है। आकृति और डिजाइन के अनुरूप रंग-विभाजन किया जाता है। संताल परगना में प्राय: सफेद, नीला, लाल और काले रंग का प्रयोग मिलता है जबकि छोटानागपुर में काला, नीला, हरा, सफेद, पीला तथा इन रंगों के मिश्रण से बने कई शेड का प्रयोग किया जाता है। चित्रों में तथा दीवार के बार्डर पर रंगों के कई परत चढ़ाये जाते हैं ताकि रंग गहरे और आकर्षक बन सकें।

संताली दीवार चित्रों में फूल, पत्ती, लता, पौध, मोर, मछली, बार्डर तथा ज्यामितीय आकृतियां विविध आकार, संपूर्ण सृजनात्मकता और रचनात्मकता से चित्रित की जाती हैं। इनकी चित्रकारी में फूल, पत्तीी और लता का आलेखन काफी पाया जाता है। फूल ज्यादातर जंगली हैं। तीन पत्तियों और चार पत्तियों वाले फूल अधिक होते हैं। पेड़-पौधें के चित्रांकन में काफी विविधता है। प्राय: पौधों के नीचे एक गमला अवश्य होता है तथा वे उपर की ओर फैलाव लेते उठते हैं। डंठल की दायीं और बांयी ओर पत्तियों में विविधता नहीं होती। डंठल में गत्यामकता होती है। डंठल के मध्‍य तथा शीर्ष पर फूल अंकित किया जाता है। इनकी चित्रकारी में प्राय: फूल पूर्ण विकसित होता है। कली या अर्धविकसित फूलों का चित्रण नहीं के बराबर है। दरवाजे पर सुरुचिपूर्ण ढंग से लत्तोदार पौधों से सज्जाकारी की जाती है। नीचे गमलों से दरवाजे के दायीं-बायीं दोनों ओर से निकलते पौधे दरवाजे के शीर्ष पर एक-दूसरे से बहुत ही खूबसूरती के साथ मिलते-खिलते चित्रित किये जाते हैं।

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों में पशुओं की तुलना में पक्षियों का चित्रण कम हुआ है। लेकिन संताली चित्र में पशुओं का चित्रण अत्यंत कम तथा मोर का काफी चित्र मिलता है। मोर प्राय: जोड़े में पौधों के उपर चित्रित किये जाते हैं। मोर के अलावा मछली भी मोर की तरह प्राय: जोड़े में चित्रित की जाती है।

इन सबके अलावे संताली दीवाल चित्रण में ज्यामितिक आकृतियों की काफी प्रधानता है। अर्धवृत्ताकार, आयताकार, वृत्ताकार, आड़ी-तिरछी रेखाएं, लहेरिया आदि ज्यामितिक आकार कहीं-कहीं ज्यादा प्रतीकात्मक हैं, तो कहीं सिर्फ अंलकारिक। डब्ल्यूजी आर्चर ने, जो संताल परगना के डिप्टी कमिश्नर थे, 'द वर्टिकल मैन' (लंदन 1944) पत्रिका में संताली चित्रकारी पर अपना कुछ विश्लेषण रखा है। उनके अनुसार 'संताली रेखांकन तथा चित्रकला में उधार्वाकार तथा क्षैतिक रेखाओं में गत्यात्मकता है, इस शैली को हम जैक ज्यामिति (वाइटल ज्यॉमेट्री) कह सकते हैं। हालांकि सब लोग इनकी राय से सहमत नहीं हो सकते, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि संताल आदिवासी में अलंकरण् की अपनी मौलिक दृष्टि है।

भौगोलिक स्थिति अलग होने के कारण संताल परगना और छोटानागपुर के संताल चित्रों में कुछ भिन्नता भी दिखती है। चित्रों में ही नहीं, बल्कि इनके रहन-सहन, घरों की बनावट, त्योहारों आदि में भी भिन्नता परिलक्षित होती है। संताल परगना के भित्ति चित्र में प्राचीनता का भाव है तो छोटानागपुर में आधुनिकता का भाव। एक में 'आकार' की प्रधानता है, तो दूसरे में 'रंग' की प्रधानता। यहां के चित्र 'उभार' लिये हुए है, तो वहां के चित्र 'समतल' हैं।''

फिलहाल छोटानागपुर की जनजातियों की कोहबर और सोहराय कलाएं जिंदा हैं। इनको आदिवासी संस्कृति की दीर्घ परम्परा के रूप में विकसित करने और उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास भी चल रहे हैं। कोहबर कला में प्राकृतिक परिवेश, और स्त्री-पुरुष सम्बंधों के विविध पक्षों का चित्रण होता है, वहीं सोहराय कला में जंगली जीव-जंतुओं, पक्षियों और पेड़-पौधों को उकेरा जाता है।

हजारीबाग जिला के जंगलों की गुफाओं में चट्टानों पर इस प्रकार के पाषाणकालीन भित्ति चित्र देखने को मिले हैं। आज भी हजारीबाग जिला एवं आसपास के क्षेत्रों में लुप्तप्राय होती बिरहोर जनजाति के घरों (कुम्बास) की दीवारों पर मिट्टी का लेप चढ़ाकर मिट्टी के रंगों से बने चित्रों में कोहबर कला की विशेषताएं प्रतिबिंबित होती हैं। प्रत्येक विवाहित महिला अपने पति के घर कोहबर कला का चित्रण करती है। यह चित्रकारी विवाह के मौसम में जनवरी से जून महीना तक की जाती है। इसमें घर-आंगन में विभिन्न ज्यामितिक आकृतियों में फूल-पत्तियों, पेड़-पौधों और नारी प्रतीकों की अनूठी चित्रकारी की जाती है। कोहबर का सामान्य अर्थ है -गुफा में विवाहित जोड़ा। कोह माने गुफा और बर माने विवाहित युगल।

सोहराय भी छोटानागपुर की जनजातियों की प्राचीन चित्रकला है। यह प्रसिध्द पर्व सोहराय से भी जुड़ी है। सोहराय पर्व दीपावली के एक दिन बाद मनाया जाता है। सोहराय चित्रकारी वर्षा ऋतु के बाद घरों की लिपाई-पुताई से शुरू होती है। कोहबर की तरह सोहराय चित्रकला भी आदिवासी औरतों में परम्परागत हुनर के कारण जिंदा है। दोनों कलाओं में फर्क उनके लिए चुने जाने वाले प्रतीकों में नजर आता है। कोहबर में सिकी (देवी का विशेष चित्रण मिलता है जबकि सोहराय में कला के देवता प्रजापति या पशुपति का। पशुपति को सांड की पीठ पर खड़ा चित्रित किया जाता है। उसका शरीर डमरू की आकृति का होता है। चित्रण शैली के लिहाज से कुर्मी सोहराय और मंझू सोहराय की दो अलग-अलग शैलियां हैं।

भारतीय राष्ट्रीय कलानिधि के क्षेत्रीय संयोजक बुलू इमाम के नेतृत्व में कोहबर और सोहराय जानजातीय कलाओं को विकसित करने का प्रयास चल रहा है। इसके लिए हजारीबाग जिला के दीपूगढ़ा में सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की गयी है। वहां जनजातीय महिलाओं को उन कलाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षित महिलाओं को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास में कुछ देशी-विदेशी मिशनरियां भी जुटी हुई हैं।


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