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झारखंड का इतिहास / झारखंड का जनजातीय जीवन  / झारखंड के विभूति झारखंड की कला  / झारखंड के धरोहर    

झारखंड की दर्शनीय स्थल झारखंड की संस्कृति / झारखंड के वाद्य-यन्त्र  / झारखंड के नृत्य

झरने बुलाते हैं

झारखंड में कई जलप्रपात हैं। इनमें से हरेक की अलग-अलग विशेषता और छटा है।

हुंडरू


यह झारखंड का सबसे प्रसिद्ध जलप्रपात है। यह रांची से करीब 42 किलो मीटर दूर स्वर्णरेखा नदी के किनारे है। यह प्रपात 74 मीटर यानी करीब 243 फीट की उंचाई से गिरता है। यह झारखंड का सबसे उंचा जलप्रपात है। बरसात के दिनों में इसकी धारा मोटी हो जाती है। बरसात के दिनों में तो इसका दृश्य और भी सुंदर व मनमोहक हो जाता है। इसी जलप्रपात से सिकीदरी में पनबिजली का उत्पादन किया जाता है।

 

दसम


यह जलप्रपात रांची से करीब 25 किलो मीटर दूर दक्षिण पूर्व में कांची नदी पर स्थित है। यह जलप्रपात करीब 40 मीटर यानी करीब 130 फीट की उंचाई से गिरता है। इसमें दस धाराएं हुआ करती थीं। इसलिए इसका नाम दसम पड़ा।

 

सदनी


रांची के पश्चिमी क्षेत्र यानी गुमला जिला में शंख नदी पर सदनी जल प्रपात है। इसकी धरा 61 मीटर यानी करीब 200 पफीट की उंचाई से गिरती है।

 

जोन्हा


 रांची शहर से दक्षिण पूर्व में करीब 35 किलो मीटर दूर जोन्हा जलप्रपात है। यह गौतम धारा के नाम से भी जाना जाता है। इसकी उंचाई 26 मीटर यानी 85 फीट है। इसकी धारा निरंतर बहती रहती है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
हिरणी: रांची-चाईबासा मार्ग पर रांची से करीब 72 किलोमीटर दूरी पर पश्चिमी सिंहभूम जिले में हिरणी जलप्रपात है। यह प्रपात जंगल के बीच है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।

 

हिरणी


रांची-चाईबासा मार्ग पर रांची से करीब 72 किलोमीटर दूरी पर पश्चिमी सिंहभूम जिले में हिरणी जलप्रपात है। यह प्रपात जंगल के बीच है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।

 

गौतम घाघ और बूढ़ा घाघ


पलामू के महुआ टांड़ से दक्षिण पूर्व 10 किलो मीटर की दूरी पर गौतम घाघ जलप्रपात है। इसकी उंचाई 36 मीटर (120 फीट) है। उसी के पास 142 फीट की उंचाई वाला बूढ़ा घाघ जलप्रपात है।

 

राजरप्पा जलप्रपात


 रामगढ़ कैंट(हजारीबाग जिला) से पूरब करीब 25 किलो मीटर की दूरी पर राजरप्पा जलप्रपात है। अनोखे प्राकृतिक दृश्य के इस जलप्रपात का धार्मिक महत्व है। यहां मेला भी लगता है। यह जलप्रपात दामोदर नदी और भेड़ा नदी के संगम पर अवस्थित है।

 

मोतीझरा


संथाल परगना में स्थित मोतीझरा जलप्रपात करीब 46 मीटर की उंचाई से गिरता है। यह गंगा की सहायक नदी पर है और राजमहल की पहाड़ियों से उतरता है।

 

घघरी


नेतरहाट से 7 किलोमीटर उत्तार घघरी नदी पर यह जलप्रपात है। यह करीब 42 मीटर (140 फीट) की उंचाई से गिरता है।  इन जलप्रपात के अलावा झारखंड में कईZ गर्म जल के झरने भी हैं। संथालपरगना और उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडलों में करीब साथ गर्म जल के झरने हैं। हजारीबाग जिला मेंsa जीटी रोड पर बड़ाहथा से 2 कि.मी. की दूरी पर नामक झरना है। यह  सर्वाधिक गर्म जल का झरना माना जाता है। यहां का पानी करीब 87 डिग्री से. गर्म होता है। धनबाद में दामोदर नदी से 7 कि.मी. दूर तेतुलिया में गर्म जल का झरना है।

 

झील


झारखंड में प्राकृतिक झीलों की संख्या 7 है (1) हजारीबाग झील, हजारीबाग, (2) रांची लेक, रांची,
(
3) नेतरहाट झील, रांची, (4) डिमना (9510.45 हेक्टेयर), जमशेदपुर, (5) जुबली पार्क झील (16.15 हेक्टेयर), जमशेदपुर,(6) बेल्डीह झील, जमशेदपुर और (7) तोपचांची झील, धनबाद-गिरिडीह।

 

जलाशय


झारखंड में चार तरह के करीब 94 कृत्रिम (मानव निर्मित) जलाशय हैं। उनका कुल क्षेत्रफल है - 73336.00 हेक्टेयर। वृहद जलाशय : मैथन डैम(11491 हेक्टेयर, धनबाद), चांडिल डैम(पूर्वी सिंहभूम) आदि। बड़े जलाशय : कैनाल डैम, संथालपरगना (10000 हेक्टेयर), पंचेत डैम, धानबाद (7511 हेक्टेयर), तिलैया डैम, हजारीबाग जिला(6475 हेक्टेयर), मयूराक्षी डैम, दुमका जिला(6734 हेक्टेयर), तेनुघाट डैम, गिरिडीह जिला (6000 हेक्टेयर) आदि। मझोले जलाशय : गेतालसूद, रांची जिला(3500 हेक्टेयर), कोनार डैम, हजारीबाग (2792 हेक्टेयर) आदि।
छोटे जलाशयों की संख्या : 86 (कुल क्षेत्रफल करीब 18833 हेक्टेयर)। इन जलाशयों में से सिर्फ 14 बड़े, मझोले और छोटे जलाशयों, जिनका जल क्षेत्र 13311 हेक्टेयर है, को राज्य सरकार के मत्स्यपालन विभाग ने मछलीपालन की गतिविधियों के लिए ले रखा है। फिलहाल इन जलाशयों से मछली उत्पादन की दर 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 17 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष है।

 

एक बार आओ: बार-बार आओगे

सम्मेत शिखरजी


गिरिडीह जिला स्थित पारसनाथ पर्वत झारखंड राज्य की अमूल्य सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर है। यह झारखंड का सबसे उंचा और सबसे बड़ा पहाड़ है। इसकी उंचाई करीब 4500 फीट है। पूरा पहाड़ जंगल से घिरा हुआ है। यहां की प्राकृतिक छटा अद्भुत है। कई ऐसी जड़ी-बूटियों के लिए भी यह पहाड़ प्रसिद्ध है, जो लुप्तप्राय हैं। यह पहाड़ जैन धर्मावलम्बियों के लिए पवित्र तीर्थ स्थल है। इस पहाड़ पर जैन धर्म के कुल 24 में से 20 तीर्थंकरों को निर्वाण प्राप्त हुआ था। प्रथम तीर्थंकर श्री श्रृषभदेव थे, जिन्होंने जैन धर्म की स्थापना की थी। चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर थे, जिनके कारण जैन धर्म विश्व भर में फैला। इसलिए हर जैनी की यह हार्दिक इच्छा होती है कि वह साल में कम से कम एक बार दर्शन लाभ के लिए इस पर्वत के शिखर पर पहुंचे। पारसनाथ पहाड़ पर प्रथम, बारहवें, बाइसवें और चौबीसवें तीर्थंकर छोड़ शेष बीस तीर्थंकरों को निर्वाण प्राप्त हुआ था। 23वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ के नाम पर ही पहाड़ का नाम पारसनाथ पहाड़ पड़ा। पहाड़ के शिखर पर बीसों तीर्थंकरों के चरण चिन्ह अंकित हैं। इस शिखर को 'सम्मेत शिखरजी' कहा जाता है। तीर्थंकरों के चरण चिन्हों को 'टेंक' कहा जाता है। उन बीस टींकों के अलावा शिखर पर 11 अन्य टींक भी हैं, जो अन्य मुनियों एवं धर्मगुरुओं के हैं। यहां एक जलमंदिर भी है, जिसमें 20 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं। जलमंदिर की विशेषता यह है कि इसमें सालों भर पहाड़ से पानी आता रहता है और मंदिर के चारों तरफ बने हौदों से निकलता जाता है। सम्मेत शिखर तक की पूरी चढ़ाई नौ किलोमीटर की है। यह चढ़ाई आनंददायक भी है और रोमांचकारी भी। पैदल चढ़ने में चार से पांच घंटे लगते हैं। शिखर से नीचे तलहटी में देखने पर चारों ओर का नजारा देखते ही यात्री अपनी सारी थकन भूल जाते हैं। इस पवित्र तीर्थ को दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायों के जैनी पूजते हैं। पहाड़ी के नीचे की बस्ती है- मधुबन। यहां बड़ी-बड़ी जैन धर्मशालाएं हैं, जिनमें ठहरने की नि:शुल्क व्यवस्था है। यहां भी नये-नये संस्थान और मंदिर स्थापित किये जा रहे हैं। हजारीबाग से करीब 80 किलोमीटर उत्तार पूर्व में स्थित इस तीर्थ स्थल पर सफेद एवं रंगीन पत्थरों से बना सामोसरण मंदिर, भूमिया बाबा मंदिर, राजदाहा जलाशय जैसे दर्शनीय स्थल भी हैं।

 

शक्तिपीठ राजप्पा


राजरप्पा स्थित सिद्धपीठ देश की 51 सिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह हजारीबाग जिला के रामगढ़ से करीब 31 किलोमीटर दूर है। दो नदियों, भैरवी और दामोदर के संगम पर मां छिन्नमस्तिका का मंदिर है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में सरकार ने मान्यता दे रखी है।

 

वैद्यनाथ धाम


देवघर जिला का यह प्रसिद्ध तीर्थ स्थल शिव की नगरी के नाम से पूरे देश में चर्चित है। वैद्यनाथ शिवलिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख है। वैद्यनाथ मंदिर में सावन(जुलाई-अगस्त) में जो मेला लगता है, उसमें देश-विदेश से लाखों हिंदू तीर्थयात्री पहुंचते हैं। मंदिर लगभग 22 मीटर उंचा है। इसके अतिरिक्त देवघर में नौलखा मंदिर, लीला मंदिर, सतसंग आदि भी दर्शनीय हैं। मुख्य शहर से 6 किलो मीटर दक्षिण पूर्व में तपोवन है, जहां प्राकृतिक गुपफाएं और शिलाखंड आकर्षित करती हैं। शहर से 16 किलोमीटर दूर त्रिकुट पर्वत है, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। देवघर से 43 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ का भव्य मंदिर है।

 

मलूटी


 दुमका जिले का यह गांव 'मंदिरों का गांव' के रूप में विख्यात है। पश्चिम बंगाल की सीमा पर स्थित दुमका जिला का प्राचीन मलूटी गांव द्वारका नदी के तट पर बसा है। दुमका से करीब 55 किलोमीटर दूर। रामपुर हाट इस गांव का निकटतम रेलवे स्टेशन है। यहां तक दुमका-रामपुर सड़क पर सूरी चुआ नामक स्थान पर बस से उतर कर उत्तार की ओर 5 किलोमीटर की दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है।
यहां 74 मंदिर जीर्णावस्था में थे। उनमें से 42 मंदिरों के संरक्षण का कार्य पूरा हो चुका है। बिहार के पुरातत्व विभाग ने 1984 में पूरे गांव को पुरातात्विक प्रांगण के रूप में विकसित करने की योजना के तहत मंदिरों का संरक्षण कार्य शुरू किया। आज पूरा गांव पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहा है।
मंदिरों की पाषाण मूर्तियां और फलक प्राचीन स्थापत्य कला के अनोखे और दुर्लभ प्रमाण हैं। यहां स्थित देवी मौलिक्षा मंदिर तो अभी भी एक जीवंत शक्तिपीठ माना जाता है। मलूटी का पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध तांत्रिक शक्तिपीठ 'तारापीठ' से सीधा सम्बंध है। कहा जाता है कि प्रसि( साध्क 'वामाखेपा' की साध्ना देवी मौलिक्षा के अंक में ही पूरी हुई थी। वामाखेपा की जीवन लीला मां तारा से जुड़ी थी और उनकी समाधि तारापीठ में है। आज भी वामाखेपा का त्रिशूल मलूटी में स्थापित है। यहां के मंदिरों में रामायण के विभिन्न दृश्य उकेरे हुए हैं। कृष्ण लीलाएं भी चित्रित हैं। एक प्रतिमा ऐसी भी है, जिसमें राम-कृष्ण-शंकर और विष्णु को एकाकार दिखाने का प्रयास अनोखा है।
मलूटी से पूर्व पाषाण काल के पत्थर के औजार और पालकालीन मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं। यह पुरातात्विक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण और दर्शनीय गांव है। अब तो गांव और आसपास के क्षेत्रा को रमणीक और आकर्षक बना दिया गया है। यहां काली पूजा के अवसर पर बहुत बड़ा मेला लगता है। यहां तीर्थयात्री भी पहुंचते हैं और आम सैलानी भी।

 

जुबली पार्क


टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी के संस्थापक जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा की स्मृति में इस भव्य पार्क का निर्माण किया गया। यह छोटे रूप में कर्नाटक राज्य में स्थित प्रसिद्ध वृंदावन गार्डन जैसा है। यहां सैकड़ों किस्म के गुलाब सहित तरह-तरह के पफूलों की बहार और कई-कई दुर्लभ प्रजातियों के पेड़ों की हरियाली का नजारा पर्यटकों को आकर्षित करता है। पानी के रंग-बिरंगे फव्वारे, कृत्रिम झरने और करीब 40 एकड़ में पफैली झील और झील के बीच में पानी का उफंचा फव्वारा! शाम होते ही जुबली पार्क का दृश्य बदल जाता है। बिजली की रंग-बिरंगी रोशनियों का जादू जैसे जमीन के छोटे से टुकड़े पर स्वर्ग को उतार लाता है। जुबली झील में नौकाविहार का आनंद लिया जा सकता है। झील के साथ ही जुड़ा है बोटहाउसनुमा जलपान गृह। हर साल तीन मार्च के दिन जमशेदजी टाटा के जन्म दिन के अवसर पर पूरा जमशेदपुर जश्न मनाता है। उस दिन पूरा शहर त्योहार मनाता है। पूरे शहर में मेला जैसा नजारा होता है। उसमें जुबली पार्क ! - जैसे खूबसूरत शहर के माथे पर आकर्षक सतरंगी टीका। उसे देखे बिना किसी की आंखों की प्यास नहीं बुझती। इस पार्क के निर्माण की शुरुआत 1935 में पर्सी लंकास्टर ने की थी। जी.एच. क्रमवीगेल और वी. एस. निरोदी ने इसे 1955 में पूरा किया। वे मैसूर के वृंदावन गार्डन और दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के प्रसि( मुगल गार्डन के शिल्पी भी रहे हैं। जुबली पार्क का उद्धाटन भारत के प्रथम प्रधनमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था।
पूरे झारखंड में ऐसे ही सैकड़ों दर्शनीय स्थल हैं। यहां प्रकृति का अनगढ़ सौंदर्य बिखरा पड़ा है। लगभग हर जिले में दर्जनों पर्यटक स्थल हैं - पहाड़, पर्वत, झरने, जंगल, अभयारण्य और पिकनिक स्पॉट। मौसम के बदलते नजारे। बांसुरी और मांदल की मादक गूंज!

 

रांची


झारखंड की राजधनी रांची प्रकृति की गोद में है। यहां शहर के बीच 'रांची पहाड़ी' है। घुमावदार सीढ़ियों से शिखर पर पहुंचें तो पूरा शहर नजर आता है। यहां 'टैगोर हिल' भी है। आकार में रांची पहाड़ी से भी बड़ा। कवि गुरफ रवींद्रनाथ ठाकुर साहित्य सृजन के लिए इसी पहाड़ी पर एकांतवास करते थे। उन्होंने पहाड़ी पर सुंदर सा मकान भी बनवाया था। पहाड़ी के एक निर्जन कोने में छोटा सा चबूतरा बना हुआ है - उपर सीमेंट की छतरी। वहां से सूर्यास्त और सूर्योदय के वक्त सामने दूर तक फैले प्रकृति के सौंदर्य को देखा जा सकता और उसके मौन संगीत को सुना जा सकता है। कहा जाता है कि कवि गुरू रवींद्र ने अपनी अमर कृति 'गीतांजलि' के कई अंशों की रचना यहीं की थी। शहर से करीब छ: मील दक्षिण पश्चिम की पहाड़ी पर प्राचीन जगन्नाथ मंदिर है। यह उड़ीसा के प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर की अनुकृति जैसा है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं हैं। इसका निर्माण 1691 में नागवंशी राजा ठाकुर ऐनी शाह ने किया था। पुरी की तरह यहां भी रथ-यात्रा का आयोजन किया जाता है। इसके अलावे रांची में कई गिरजाघर हैं,जो वास्तुकला के जीवंत नमूने हैं और उनके लाल पत्थर अतीत की कहानी कहते हैं। रांची के आसपास हुंडरू जलप्रपात, जोन्हा जलप्रपात, दसम जलप्रपात और हिरणी जलप्रपात तो हैं ही, मुख्य शहर में कांके डैम और शहर से सिपर्फ 12 किलोमीटर दूर हटिया डैम हैं, जो अपने मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य से पर्यटकों को बरबस अपनी ओर खींच लेते हैं। ये तमाम स्थल बढ़िया पिकनिक स्थल हैं।

 

नेतरहाट


समुद्रतल से करीब 3700 फीट की उफंचाई पर अवस्थित नेतरहाट शहर का मौसम सालों भर समशीतोष्ण रहता है। वर्षा के मौसम में यहां सिर्फ पानी की बौछारें नहीं बल्कि बादलों के बीच से गुजरता है शहर। यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त विशेष आकर्षण का केंद्र है। पर्यटकों के लिए यहां बने टूरिस्ट बंगला और पलामू बंगला से यह नजारा देखा जा सकता है। मुख्य शहर से करीब 10 कि. मी. दूर 'मैगनोलिया प्वाइंट' है। यह सूर्यास्त के दृश्य को देखने के लिए सबसे उपयुक्त जगह है। नेतरहाट का समूचा क्षेत्रा घने जंगलों, उफंची-नीची पहाड़ियों और नदियों-झरनों से घिरा हुआ है। मुख्य शहर से करीब 8 किलो मीटर दूर 'अपर घघरी' जलप्रपात है। यह लोकप्रिय पिकनिक स्थल है। यहां से सिर्फ दो किलो मीटर की दूरी पर 'लोअर घघरी' जलप्रपात है। यह भी पिकनिक स्थल है। शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर है 'सदनी' जलप्रपात। सर्पिल आकार का यह जलप्रपात भी पिकनिक स्पॉट है। 'लोध' जलप्रपात भी संभवत: झारखंड के सबसे उंचे जलप्रपातों में से एक है। यह करीब 468 फीट की उंचाई से गिरता है। बलखाती 'कोयल' नदी भी नेतरहाट के पास ही है। इसे 'कोयल व्यू प्वाइंट' से घंटों निहारा जा सकता है।

 

हजारीबाग


यहां के कैपरी हिल से पूरे शहर को निहारा जा सकता है। 25 किलोमीटर दूर नेशनल पार्क के नाम से प्रसिद्ध हजारीबाग अभयारण्य है। यहां रात के समय भी मोटर गाड़ियों में बैठकर सर्च लाईट के जरिये वन्य पशुओं को देखा जा सकता है - सांभर, नीलगाय, चीतल और भालू सहित बाघ, चीते, तेंदुए और गैंडे भी। रजरप्पा में छिन्नमस्तिका का मंदिर है ही। उसके अतिरिक्त कोनार डैम, तिलैया डैम और हजारीबाग लेक भी है। हजारीबाग लेक जलक्रीड़ा के लिए प्रसिद्ध है। पुराना हजारीबाग जिला के चतरा पहुंचने वाले लोग कौलेश्वरी पहाड़ी का मंदिर देखना नहीं भूलते। यह स्थान ऐसा है, जहां सिख पंथ के प्रथम गुरफ नानकदेव के उपदेश गूंजे थे। वहां सिखों की ऐसी आबादी बसी हुई है, जो स्थानीय संस्कृति से घुलमिल गयी है और धर्म व संस्कृति का देश काल से परे एक नये अलग स्वरूप का दर्शन कराती है। सिखों की वह आबादी सिख गुरुओं के निर्देशों का पालन करते हुए ही दो-तीन सौ साल पहले स्थानीय संस्कृति में रच-बस गयी। वही पहाड़ी पर स्थित कौलेश्वरी मंदिर की टस्ट्री है। वहां सालों भर हिंदू, सिख और बौद्ध व जैन धर्मावलम्बी यात्रियों की भीड़ लगी रहती है।

 

धनबाद


यह कोयलांचल है। 'काला सोना' की नगरी। यहां शोधर्थियों और तकनीकी ज्ञान प्राप्त करने वालों को बार-बार आना ही पड़ता है क्योंकि यहीं केंद्रीय खान अनुसंधानशाला और राष्ट्रीय ईंधन अनुसंधनशाला हैं। सिंदरी में बीआईटी है, जो कभी अपनी पढ़ाई के लिए आईआईटी के समकक्ष माना जाता था। हांलांकि आज भी टैक्नालॉजी की शिक्षा और शोध के मामले में विस्तृत जानकारियों के लिए बीआईटी छात्रों-युवकों को आकर्षित करता है। जो लोग किसी भी कार्यवश धनबाद पहुंचते हैं, वे मैथन और पंचैत डैम घूम आना नहीं भूलते। मैथन डैम धनबाद से 58 और पंचैत डैम 54 किलोमीटर दूर है। मैथन एशिया के सबसे बड़े बांधें में से एक है। बाराकर नदी पर बना यह डैम 162 पफीट उंचा है और करीब 15712 फीट लम्बा है। इसका जल-विस्तार 66 वर्ग किलोमीटर है। मैथन शब्द 'माई स्थान' से निकला है। यहां विश्वप्रसिद्ध शक्ति पीठ 'कल्याणेश्वरी' मंदिर है। ग्रामीण समाज में देवी का वास जहां होता है, उसे माई का स्थान कहते हैं। विकास के आधुनिक मंदिरों की पूजा करने वाले लोगों के लिए मैथन डैम सचमुच में माई का स्थान है- तीर्थ स्थल भी और पिकनिक स्पॉट भी। पंचैत डैम दामोदर नदी पर बना हुआ है। इस डैम की उंचाई 134 फीट और लम्बाई 22155 फीट है। जो मैथन जाते हैं, उनके पांव अनायास पंचैत की ओर मुड़ जाते हैं। दोनों डैमों में भूमिगत पावर हाउस हैं, जो पनबिजली पैदा करते हैं। धनबाद शहर से 52 किलोमीटर दूर गोविंदपुर-गिरिडीह मार्ग पर मुख्य सड़क से दो किलो मीटर अंदर उसरी जलप्रपात है। जंगल की हरी वादियों में खण्डोजी पहाड़ से उतरता यह झरना पर्यटकों को आकर्षित करता है। मुनीडीह (धनबाद से बोकारो जाने के रास्ते पर) खान के पास जंगल में भटिंडा जलप्रपात है। वह भी अच्छा पर्यटन स्थल है। धनबाद से 36 किलोमीटर दूर जीटी रोड के करीब ही तोपचांची में ललकी व डोलकी पहाड़ियों के बीच सुंदर झील है। यहां पर्यटकों के लिए जल-क्रीड़ा की व्यवस्था है। जिला में तेंतुलिया के पास गर्म जल का झरना है तो सम्यता-संस्कृति के विकास के इतिहास व कला के अध्ययन के लिए धनबाद से सिर्फ 25 किलोमीटर पर तेलकुपी है। यहां मंदिरों के कई ध्वंसावशेष हैं। स्थापत्य कला में रुचि रखने वालों को आकर्षित करने के लिए इस क्षेत्र में कई पुरातात्विक साक्ष्य हैं।
इनके अतिरिक्त झारखंड में कई ऐसे शहर और स्थल हैं, जो पर्यटकों को खींचते हैं और उनसे बरबस फिर आने का वादा करवा जाते हैं। रांची से 60 किलोमीटर दक्षिण और खेलारी (सीमेंट फैक्ट्री) से 6 किलोमीटर दक्षिण पूर्ण में है- मैकलुस्कीगंज। यह अपने आप में 'एंग्लो इंडियन' आबादी के इतिहास की जीवन्त गाथा है। यहां जो एक बार आता है, वह यहां सदा के लिए बसने का सपना लेकर जाता है। पलामू जिला में डाल्टनगंज से सिर्फ 20 किलो मीटर की दूरी पर बेतला राष्ट्रीय उद्यान है। यह बाघों के लिए सुरक्षित बाग भी है। यह 970 वर्ग किलोमीटर में फैला है। यहां गिनती के हिसाब से 62 बाघ होने के प्रमाण हैं। बाघ के अलावा हाथी, चीता, हिरण, अजगर, भेड़िया और जंगली कुत्तो भी! जिनको वनों का तिलिस्मी आतंक आकर्षित करता है, वे गढ़वा, पांकी, बालूमाथ, मनातू और लातेहार तक फैले जंगलों में घूमते-भटकते हैं। पश्चिमी सिंहभूम जिला के सारंडा जंगल तो सघन हैं ही, वहां इतने उंचे- उंचे और बड़े व्यास के पेड़ हैं कि देखने वाले चकित रह जायें। इसी जिला में गुआ और किरिबुरू हैं जो झारखंड में 'शिमला' के नजारे प्रस्तुत करते हैं। वहां की पहाड़ियों पर बादलों के बीच से गुजरते हुए गर्मियों में भी गर्म कपड़े पहनने का मजा ही कुछ और है। पूर्वी सिंहभूम में डिमना झील है - जमशेदपुर के पास का सबसे मशहूर पिकनिक स्पॉट! यह झील दलमा पर्वत श्रृंखला का हिस्सा भी है और टिस्को के तकनीकी हाथों का कमाल भी। यह जमशेदपुर से 10 मील उत्तर-पूर्व टाटा-कोलकाता सड़क के किनारे है। एक शहर से निकल कर दूसरे शहर तक जाने वालों के लिए पूरा टेल्को शहर ही अपने आप में घूमने का स्थान है। कुदरत की अनगढ़ सुंदरता को आधुनिकता की जगमगाहट से जोड़कर शहर को किस तरह बसाया जा सकता है - इसका बेमिसाल नमूना है टेल्को शहर। शहर में फैक्ट्री है लेकिन पर्यावरण के प्रति संवेदनशील! गुमला जिला में हैं भस्मासुर की तपोभूमि, रामरेखा धम और अष्टभुज मंदिरों के साथ-साथ ईसाइयों के पुराने चर्च हैं, जो पश्चिमी और पूर्वी स्थापत्य कला के संगम हैं। दुमका में वीरान से जंगल के फैलाव के बीच मयूराक्षी नदी पर बनी है मसांजोर झील! वहां पहुंचने वाले सैलानी निर्जन एकांत में जंगल और झील को मौन की भाषा में आपस में गुपचुप बतियाते देखते हैं। पंछियों के कलरव संगीत से सजे उस मौन-मुखर एकांत संवाद को घंटों देखते-सुनते हैं।
अब तो इस मसांजोर झील (डैम) को निहारने के लिए दुमका से करीब चार किलोमीटर दूर दुमका हवाई अड्डा के पास कुरफआ पहाड़ी पर एक जूते का घर भी बन गया है। बूट हाउस! पहाड़ी के शिखर पर जूते की आकृति की यह खूबसूरत इमारत 100 फीट से उंची है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ही यह जूता घर बना है। दुमका पहुंचते ही दूर पहाड़ी पर स्वागत करता सा जूता देख पर्यटक नाराज नहीं होते। हर पर्यटक के पांव पहले उसी जूते में समाने को मचल उठते हैं। शिखर पर एड़ी के बल पर खड़े इस विशालकाय जूते में एड़ी में जलपान गृह है, सोल से अंदर प्रवेश का रास्ता है। वहीं से जूते के पंजे और अंगूठे तक जाने के लिए घुमावदार सीढ़ियां हैं। अंगूठा यानी खूबसूरत बालकानी से दिखता है प्रकृति के मनोरम दृश्य - हरे-भरे खेत, पहाड़ियां, मयूराक्षी नदी, ढलता सूरज और मसांजोर डैम!
यह कहना मुश्किल है कि वह जूता घर किस राजनीतिक चिंतन का परिणाम है - जूता खाने वाला या कि जूता ढोने वाला? हां, दुमका आने वाले हर पर्यटक का दिमाग उस जूते में समाने के पहले अनायास इस सवाल के फीते से बंध् जाता है, भले ही जूते के अंगूठे में सिर घुसाते ही सामने के प्राकृतिक दृश्य देख उसका दिल मंत्रमुग्ध हो जाये और खुद को हर बंधन से मुक्त महसूस करे। जूते से बाहर निकलने के पहले उसे सिर्फ इतना मालूम हो पाता है कि यह जूता एक साल पहले 1999 में झामुमो विधायक स्टीफेन मरांडी के विधायक कोष से बना।


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