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जनजातीय जीवन

झारखंड में 30 प्रकार की अनुसूचित जनजातियां हैं। उनकी कुल आबादी 7087068 (2001 की जनगणना के अनुसार) है। करीब 92 प्रतिशत (6500014)जनजातीय आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और सिर्फ 8 प्रतिशत (587054) आबादी शहरों में रहती है।

अनुसूचित जनजातियों को दो श्रेणियों में रखा गया है। 'जनजाति' और 'आदिम जनजाति।' झारखंड में 21 जनजातियां प्रमुख जनजाति की श्रेणी में आती हैं। वे हैं 1.संताल 2.उरांव 3.मुंडा 4.हो 5.खरवार 6.भूमिज 7.खड़िया 8.गोंड 9. महली 10.बेदिया 11.चेरो 12.चिक-बड़ाइक 13.किसान 14.बिंझिया 15.गोराइत 16.करमाली 17.बैगा 18.खांड़ 19.बथुड़ी 20.बंजारा और 21.लोहरा।  

बाकी 9 जनजातियां यानी बिरहोर, कोरबा, असुर, परहइया, बिरजिया, सौरिया पहाड़िया, माल पहाड़िया, कोरा और सावर को आदिम जाति की श्रेणी में रखा जाता है। आदिम जातियां अल्पसंख्यक हैं। उनकी अर्थ व्यवस्था कमोबेश आज भी प्राथमिक स्तर की है। वे आज भी जंगल में शिकार करने और जंगल से ही भोजन जुटाने के आदिम संस्कारों से लैस हैं। हालांकि अब उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं रहा। उनमें भी अब आजीविका के लिए एक जगह स्थायी तौर पर टिकने की समझ पैदा हो रही है।

भाषा की दृष्टि से जनजातियों के दो समूह हैं। ग्रियर्सन ने झारखंड क्षेत्र की जनजातीय भाषाओं को आस्ट्रिक(मुंडा)और द्रविड़ियन समूह में बांटा है। अधिसंख्य जनजातीय भाषाएं आस्ट्रिक समूह में आती हैं। सिर्फ उरांव जनजाति की 'कुरुख' भाषा और सौरिया पहाड़िया की 'माल्टो' भाषा द्रविड़ समूह की मानी जाती हैं। शरतचंद्र राय के अनुसार छोटानागपुर में बसी सभी आस्ट्रिक भाषाई समूह की जनजातियों का भारत के उत्तरी भाग से ऐतिहासिक संबंध है। द्रविड़ भाषायी समूह के माने जाने वाले उरांव और सौरिया पहाड़िया लोगों के बारे में अनुमान है कि वे सबसे पहले दक्षिण से चले थे। संभवत: नर्मदा के क्षेत्र से। वे पहले रोहतास में और बाद में छोटानागपुर और संतालपरगना में बसे।

प्रजातीय अध्ययन के अनुसार झारखंड क्षेत्र की जनजातियां 'प्रोटो आस्ट्रोलायड' प्रजाति मानी जाती हैं। यहां की लगभग सभी जनजातियों में नाटा कद, दीर्घ कपाल, फैली चिपटी नाक और काला चमड़ा सामान्य शारीरिक लक्षण हैं। प्रजातीय अध्ययन के अनुसार कपाल, मुख की आकृति, बाल और चमड़े के रंग आदि में झारखंड की जनजाति, श्रीलंका की वेड्डा जनजाति और आस्ट्रेलिया के मूल निवासी काफी हद तक मिलते-जुलते हैं।     

सामाजिक जीवन

आज झारखंड के जनजातीय परिवार पितृसत्तात्मक हैं। यूं अब यह विषय किसी साक्ष्य का मोहताज नहीं कि जनजातीय परिवार पहले मातृसत्तात्मक हुआ करते थे। लेकिन यह खोज का विषय है कि ये कब से पितृसत्तात्मक होते गये। वैसे, आज भी इस बात के संकेत मिलते हैं कि कई जनजातियों में पितृसत्तात्मकता का विकास तब से शुरू हुआ, जब से उनके जीवन के धारण-संचालन-नियंत्रण का 'प्रकृति' से सीधा संबंध कमजोर व असंतुलित होने लगा।

प्रत्येक जनजाति कई गोत्रों में विभक्त है। प्रत्येक गोत्र का अपना गोत्र चिन्ह होता है। इसे टोटम कहा जाता है। यह सामान्यत: पशु-पक्षी या पौधे के नाम पर होता है। प्रत्येक जनजाति गोत्र के बाहर ही विवाह करती है। गोत्र के अंदर विवाह करना जनजातीय समाज में अपराध माना जाता है। हालांकि जनजातियां अपनी जनजाति के अंदर ही विवाह करती हैं। संतान पिता का गोत्र पाती है, मां का नहीं। शादी होने के बाद लड़की पति का गोत्र अपनाती है। जनजातियों में अधिसंख्य परिवार एकाकी होते हैं। परिवार में माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है। कुछ जनजातियों में संयुक्त परिवार होते हैं लेकिन उनमें भी ज्यादा से ज्यादा दो पीढ़ियों के लोग साथ रहते हैं। 

गोत्र : सौरिया को छोड़ कर अन्य सभी 29 जनजातियां कई गोत्रों में विभक्त हैं। संतालों में कुल 12 गोत्र पाये जाते हैं - हंसदा, मुर्मू, किस्कू, हेम्ब्रम, मरांडी, सोरेन, टुडु, बासके, बेसरा, पौड़िया, चोंडे और बेदिया। हालांकि मूल गोत्र प्रथम सात ही माने जाते हैं लेकिन सामाजिक दृष्टि से सब समान हैं।

उरांव में भी करीब 14 प्रमुख गोत्र पाये जाते हैं- लकड़ा, रफंडा, गारी, बांडी, किसपोट्टा, तिर्की, टोप्पो, एक्का, खलखो, लिंडा, मिंज, कुजूर, बेक और केरकेट्टा।

मुंडा जनजाति में गोत्र विभाजन से मोटे तौर पर दो समूह बने हैं। एक को 'महली मुंडाको' कहा जाता है और दूसरे को 'कोमपाट मुंडाको।' महली मुडाकों मुख्यत: तमाड़ इलाके में बसे हैं, जो 'पातर' नाम से जाने जाते हैं।

खड़िया जनजाति के तीन सामाजिक वर्ग हैं - पहाड़ी खड़िया, दुध खड़िया और ढेलकी खड़िया। पहाड़ी खड़िया के दस प्रमुख गोत्र हैं - कुलसी, खेलुआ, कुजूर, अंगारिया, भुइयां, गुलु, जारू, बध, तेसा, हेम्बरम आदि। ढेलकी खड़िया के आठ गोत्रा पाये जाते हैं - मुरू, सोरों, समद या बागे, हंसदा या दमदम, बारलीहा, जारहाद, टोप्नो और भाई। दुध खड़िया में नौ प्रकार के गोत्र पाये जाते हैं- दुमदुम, टोप्पो, सोरेन, केरकेट्टा, कुलु, बिलुंग, बास, टेरू और कीर।

बिरहोर में उथलू और जांधी दो तरह के समुदाय पाये जाते हैं। जो बिरहोर जंगल-जंगल घूमते हैं, यायावर जिंदगी जीते हैं, वे उथलू या फिरंता कहलाते हैं। जो बिरहोर जंगल-जंगल भटकना छोड़कर कहीं गांव बना कर स्थायी रूप से बस गये हैं, उन्हें जांधी या पनीया कहा जाता है। बिरहोर के 23-24 गोत्र पाये गये हैं - टोपवार, इंदुआर, वसवार, थनवार, केरकेट्टा, हेम्ब्रम, कछुआ, खेर, लकुरचट्टा, मछली, बराह, कौआ, गिद्ध भुइया, गेरुआ, गुंडरी, तिरीवर, केंदुआ, लुडीजाल, सिगपुरिया, तोरियार, महली, सुइया, भुरुम आदि।

जनजातीय समाज में गोत्र महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन है। इसके जरिये कई आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रणालियों व कार्यों का संचालन व नियंत्रण किया जाता है। प्रत्येक गोत्र अपने दायरे में आने वाले समुदायों और परिवारों के सदस्यों के लिए नियम बनाता है और उनके पालन की सीख देता है। नियमों की अवहेलना करने पर किसी सदस्य को गोत्र के बाहर भी किया जा सकता है। इस डर से लोग गोत्र के नियमों की अवहेलना नहीं करते।

एक गोत्र के सभी सदस्य अपने को एक ही पूर्वज की संतान मानते हैं। इस वजह से वे एक दूसरे को भाई-बहन मानते हैं। अपने गोत्र के सदस्यों से शादी करना वर्जित मानते हैं। गोत्र एक सामाजिक संस्था के रूप में अपने सदस्यों को विवाह संबंधी नियम के तहत आचरण करने और गोत्र से बाहर शादी करने के प्रति जागरूक रखता है।

जनजातीय जीवन में गोत्र सामाजिक संबंधों में आपसी सहायता और सुरक्षा के मजबूत धागों का सृजन करता है। यहां तक कि झारखंड के अनेक क्षेत्रों में आज भी यह दृश्य देखने को मिलता है कि किसी घर के एक सदस्य के बीमार पड़ते ही उसके गोत्र का पूरा गांव इलाज के लिए उमड़ पड़ता है। शादी-ब्याह से लेकर दुर्घटनाओं व मुसीबतों तक में गोत्र के नाम पर लोग एक दूसरे की अनायास मदद करने को प्रेरित होते हैं।

जनजातियों में स्थानीय प्रशासन के लिए गठित परिषद, पंचायत आदि में मुखिया, सरदार या राजा का पद एक निश्चित गोत्र का सदस्य ही संभालता है। प्रशासन   सम्बंधी अन्य कार्य भी गोत्र नामों के अनुसार चुने गये व्यक्ति ही करते हैं। जनजातीय समाजों में गोत्र ही लोगों को नैतिक और धार्मिक बंधनों में बांधता है। लोगों में सामूहिकता का ऐसा संस्कार भरता है कि परस्पर की सहायता और सुरक्षा के लिए एक गोत्र के लोग किसी भी वक्त और किसी भी कीमत पर कोई भी काम करने के लिए तैयार रहते हैं। यहां तक कि गोत्र सिर्फ सामाजिक सम्पत्ति नहीं बल्कि व्यक्तिगत सम्पत्ति को भी सुरक्षा प्रदान करता है।

विवाह : झारखंड की जनजातियां अमूमन अपनी-अपनी जातीय सीमाओं के अंदर ही विवाह करती हैं। समान गोत्र में विवाह करना वर्जित है। जनजातियों में आम तौर पर बाल विवाह का प्रचलन नहीं है। प्राय: परिवार एक विवाही होते हैं। लेकिन कोल्हान क्षेत्र में एक पति और दो या दो से अधिक पत्नियों के कई किस्से मशहूर हैं। यह वहां आम है कि एक पति की दो या दो से अधिक पत्नियां एक ही घर में रहती हैं। वर्षों साथ रहने का यह दृश्य एहसास जगाता है कि वे प्रेमपूर्वक रह रहे हैं। वैसे, झारखंड की कई जनजातियों में देवर विवाह और साली विवाह का प्रचलन है। प्राय: मृत बड़े भाई की पत्नी अपने पति के छोटे भाई से विवाह कर लेती है। इसी प्रकार पत्नी के मरने या कभी-कभी पहले ही उसका पति उसकी छोटी बहन से विवाह करता है। विधवा या विधुर दोबारा शादी के लिए स्वतंत्र हैं। अक्सर विधवा किसी विधुर के साथ ही वैवाहिक बंधन में बांधती है। तलाक देने का अधिकार पति और पत्नी दोनों को होता है। विधवा विवाह और तलाक के बाद दोबारा शादी करने में दान-दहेज नहीं चलता।

झारखंड में क्रय विवाह, सेवा विवाह, हठ विवाह, हरण विवाह, विनिमय विवाह और पलायन विवाह जैसे कई तरीके चलते हैं। क्रय विवाह में वधू पाने के लिए वधू के माता-पिता या रिश्तेदारों को कुछ धन देना पड़ता है। उसे कन्या शुल्क कहते हैं। सेवा विवाह में होता यह है कि कन्या शुल्क न दे पाने की स्थिति में वर अपने होने वाले सास-ससुर की सेवा करता है और बदले में उनकी बेटी से शादी का अधिकार पाता है। हरण विवाह में लड़की का अपहरण कर शादी की जाती है। हठ विवाह में लड़की अपने प्रेमी के घर जबर्दस्ती आकर रहने लगती है। तमाम अपमान के बावजूद वह अपने प्रेमी को ही पति बनाने लिए ऐसा करती है। सहपलायन तो प्रेम विवाह है। उसमें प्रेम पाश में बंधे युवक-युवती तब भागते हैं, जब उनके माता-पिता उन्हें शादी करने नहीं देते। विनिमय विवाह गुल्टा विवाह है। उसमें एक भाई अपनी बहन की शादी दूसरे परिवार के जिस लड़के से करता है, उसी की बहन से खुद शादी करता है।

संतालों में क्रय विवाह को 'सादाई बापला' कहते हैं। इस तरह के विवाह में घर देखी, तिलक चढ़ी और 'टका चाल' की रस्में होती हैं। टका चाल की रस्म में वधू के पिता को 'पोन' शुल्क दिया जाता है। सेवा विवाह में संतालों में वधू के लिए पोन नहीं देना पड़ता लेकिन वर को कम से कम पांच साल ससुराल में रहना पड़ता है। सेवा विवाह को संताली घरदी जावांय बापला कहते हैं और विनिमय विवाह को गोलाइटी बापला। इसमें पोन का लेन-देन नहीं होता।

मुंडा जनजाति में क्रय शादी में दिये जाने वाले कन्या शुल्क को 'कुरी गोनोंग' कहा जाता है। मुंडा जनजाति में सेवा विवाह, हरण विवाह और हठ विवाह सहित पलायन विवाह के भी कुछ-कुछ उदाहरण मिलते हैं। पलायन विवाह को मुंडा जनजाति में राजी-खुशी विवाह कहा जाता है।

हो जनजाति में क्रय विवाह को 'अंदी' कहा जाता है। हो जाति में कन्या मूल्य अक्सर काफी अधिक रखा जाता है। हठ विवाह को अनादर विवाह कहा जाता है। इस जनजाति में राजी-खुशी विवाह भी होते है।

बिरहोर जनजाति में क्रय विवाह को सदर बापला कहा जाता है। विवाह की यह प्रथा बिरहोर में ज्यादा प्रचलित है। इस जनजाति के लोग सेवा विवाह को कीरींग जमाई बापला कहते हैं। इसमें हरण विवाह भी चलता है। उसे उडरा-उडरी बापला कहते हैं। हठ विवाह को बोला बापला कहा जाता है। उसमें युवती शादी के लिए उस युवक के घर में चली जाती है, जिसको वह प्रेम करती है। यदि युवक प्रेमी है और विवाह के लिए युवती को घर में आने को प्रेरित करता है तो उसे सीमन्दर बापला कहा जाता है। बिरहोर में प्रेम विवाह भी चलता है। इस जनजाति में विनिमय विवाह को गोलहर बापला कहा जाता है।

खड़िया जनजाति में क्रय विवाह को असली विवाह कहा जाता है। उसे युवक-युवती के माता-पिता द्वारा निश्चित किया जाता है। इस जनजाति में हरण विवाह की प्रथा लगभग खत्म है। हठ विवाह और पलायन विवाह भी अब प्रचलन में नहीं दिखते।

सौरिया पहाड़िया में ज्यादातर हरण विवाह होते हैं।

तलाक :  जनजातियों में भी विवाह टूटते हैं। उनमें तलाक देने का अधिकार पति और पत्नी दोनों को होता है। मुंडा जनजाति में तलाक को 'सकनाचारी' कहते हैं। तलाक के बाद औरत और मर्द दोनों पुन: शादी करने को स्वतंत्र हैं। ऐसे विवाह को सगाई कहा जाता है। सौरिया पहाड़िया जनजाति में लड़की तलाक देती है तो लड़के को उसका कन्या मूल्य वापस मिल जाता है। लड़का तलाक देता है तो उसे कन्या मूल्य की राशि नहीं मिलती।

जनजातीय विवाह प्रथाओं में 'टुडकी दिपिल बापला' जैसी प्रथा भी है। उसमें वर पक्ष कन्या को अपने घर लाकर शादी करता है।

हो जनजाति में पुरुष के अपने से बड़ी उम्र वाली स्त्री से शादी करने का प्रचलन भी है। बच्चे भी प्राय: ससुर के परिवार या कीली में ब्याहे जाते हैं। कहीं-कहीं मां की बहन और विधवा मौसी से शादी करने का रिवाज भी है। हालांकि हो जनजाति में पिता की बहन या अपनी बहन की लड़की से विवाह करने का रिवाज कम है। खड़िया जनजाति में फुफेरे अथवा चचेरे भाई-बहन से शादी करने का रिवाज चलता है। हालांकि उसमें न कोई युवक अपनी पत्नी की बड़ी बहन से शादी कर सकता है और न कोई विधवा अपने पति के बड़े भाई से शादी कर सकती है। सौरिया पहाड़िया जनजाति में गोत्रा की अवधारणा नहीं है। लेकिन शादी में गोतिया और रिश्तेदारी पर विचार होता है। इस जनजाति में देवर-भाभी के बीच पुनर्विवाह होता है और छोटी सालियों से विवाह भी स्वीकृत है लेकिन पत्नी की बड़ी बहन या छोटे भाई की पत्नी से विवाह वर्जित है। चचेरे, फुफेरे या ममेरे भाई-बहनों में भी विवाह नहीं होता।

बिरहोर जनजाति में बहुविवाह का प्रचलन नहीं है लेकिन उस पर प्रतिबंध भी नहीं है। ऐसे विवाह को 'हेसम बापला' कहा जाता है।

सभी जनजातियों के लड़कों की शादी की उम्र 20 से 24 साल होती है। लड़कियों की शादी 15 से 20 के बीच होती है।

परिवार : झारखंड की जनजातियों के परिवार पितृसत्तात्मक होते हैं। संतालों में संतानें पिता का गोत्र पाती हैं। माता-पिता की सम्पत्ति पर पहला अधिकार पुत्रों का होता है। उसमें अविवाहित बेटियों के लिए सम्पत्ति में हिस्सा का प्रावधान है। उरांव जनजाति में परिवार के धन पर सिर्फ पुरुष का अधिकार होता है। स्त्री का अधिकार नहीं होता। हो जनजाति में कीली के आधार पर परिवार बनते हैं। कीली एक सामाजिक और राजनीतिक इकाई होती है। सौरिया पहाड़िया में संयुक्त परिवार अब नहीं के बराबर हैं। उनमें सम्पत्ति पर सिर्फ पुत्रों का अधिकार होता है। बिरहोर जनजाति में पिता की मृत्यु के बाद सम्पत्ति बेटों में बंटती है लेकिन सबसे बड़े बेटे को कुछ बड़ा हिस्सा मिलता है। बेटा न होने पर परिवार के साथ रहनेवाले घर जमाई को पूरी सम्पत्ति मिलती है।

सामाजिक निषेध :  झारखंड की जनजातियों में कई प्रकार की निषेधाज्ञाएं प्रचलन में हैं। जनजातियां गोत्र चिन्हों को पूज्य मानती हैं। गोत्रों का नामकरण प्राय: पशु-पक्षी और पेड़-पौधें के नाम पर होता है। इसलिए उनकी हत्या करने या कष्ट पहुंचाने या काटने पर पाबंदी होती है। उरांव में लकड़ा(शेर), तिर्की(बड़ा चूहा), कच्छप(कछुआ), खाका(कौआ), तिग्गा(बंदर), कुजूर(लता), आदि और संतालों में हंसदा(हंस),मुर्मू(नील गाय), हेम्ब्रम(सुपारी), बेसरा(बाज), पौड़िया(कबूतर), चोंड़े (छिपकिली) आदि गोत्र के नाम हैं और उनके प्रतीक चिन्हों से छेड़छाड़ या उनको नुकसान पहुंचाना सर्वथा गलत माना जाता है। कई जनजातियों में उन प्रतीक चिन्हों से जुड़ी निषेधज्ञाएं अलिखित कानून हैं। आम धारणा यह है कि उनके उल्लंघन से अलौकिक शक्तियां नाराज हो जायेंगी और पूरे समुदाय को उनके प्रकोप का शिकार होना पड़ेगा।

समगोत्रीय विवाह और यौन संबंधों पर सख्त पाबंदी है। अपनी जनजाति से बाहर शादी करना भी हेय माना जाता है। शहरीकरण, उद्योगीकरण, संस्कृतीकरण और ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार की वजह से अन्तर्जनजातीय और गैरजनजातीय विवाहों का प्रचलन बढ़ा है लेकिन आज भी संतालपरगना के कई इलाकों में ऐसी शादियों में बंधने वाले युवक-युवतियों और परिवारों को सजा देने के लिए 'बिठलाहा' प्रथा चलती है। उस प्रथा में अब ऐसे जोड़ों और उनके परिवारों को समाज से बाहर करने के साथ-साथ उनके घरों को लूटने और हत्या करने तक की क्रूरताएं शामिल हो चुकी हैं।

हो जनजाति में औरतें न हल छूती हैं और न हल चलाती हैं। संताली औरतों के लिए मांझीथान में प्रवेश निषिद्ध है। मुंडा जनजाति में औरतें न धन बो सकती हैं और न छप्पर छा सकती हैं। इस जनजाति में विवाहित बहन को सरहुल पूजा का प्रसाद नहीं दिया जाता क्योंकि शादी के बाद उसका गोत्र बदल जाता है। मुंडा जनजाति में औरतें दाह संस्कार के वक्त श्मशान नहीं जा सकतीं। रजस्वला औरतों पर पूजा स्थल और रसोई घर में जाने पर भी पाबंदी होती है।

धार्मिक जीवन : झारखंड की जनजातियों में धार्मिक विश्वास और आस्था का आधार है- 'प्रकृति।' इसलिए इनके सामान्य जीवन में 'मारांगबुरू' और 'सिंगबोंगा' की प्रतिष्ठा है। मारांगबुरू का अर्थ है 'विशाल पहाड़' और सिंगबोंगा का अर्थ है 'सूरज'। इनके अनुसार सिंगबोंगा वह शक्ति है, जो जग के कण-कण में व्याप्त है। उसका कोई रूप या रंग नहीं होता। संताल, मुंडा, हो, बिरहोर आदि जनजातियों में आदि शक्ति एवं सर्वशक्तिमान देव को 'सिंगबोंगा' कहा जाता है। वही सृष्टिकर्त्ता है, वही पालनकर्त्ता है और कल्याणकारी है। माल पहाड़िया, उरांव और खड़िया जनजाति के लोग उसे ही धर्म, गिरींग आदि नामों से पुकारते हैं।

आदिवासियों के अन्य प्रमुख देवताओं में ग्राम देवता भी शामिल है। उसे हातु बोंगा, देसाउली बोंगा, चांडी बोंगा आदि कई नामों से पुकारा जाता है। ग्राम देवता के साथ जुड़ी मान्यता यह है कि वह गांव की रक्षा करता है। शिकार हो या खेती, उसमें सफलता के लिए ग्राम देवता की कृपा जरूरी है। जनजातियों का एक और प्रमुख देवता है- गृह देवता। उसे मुंडा, हो आदि 'ओड़ा बोंगा' कहते हैं। माना जाता है कि पूर्वज मृत्यु के बाद घरों में निराकार होकर गृह देवता के रूप में वास करते हैं।

आदिवासियों के अधिसंख्य देवता प्रकृति प्रदत्त जंगल-पहाड़ आदि होते हैं। उनको बुरू बोंगा, इकीर बोंगा आदि नामों से जाना जाता है। गांव के बाहर 'सरना' नामक स्थान होता है। माना जाता है कि वह देवताओं का निवास स्थान है। वहीं पूजा होती है और बलिदी जाती है। उसके लिए हर गांव में एक पाहन होता है। पाहन की नियुक्ति वंश परम्परा के अनुसार होती है। कहीं-कहीं पाहन के लिए चुनाव भी होता है।


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