रेणुका वर्मा के इस कविता-संग्रह में बचपन की केवल स्मृतियाँ नहीं हैं। वे एक बार िफर से अपने बचपन में लौटकर अपनी स्मृतियों के सहारे उन बिम्बों, रंगों एवं दृश्यों को सहज-सरल, संप्रेषणीय एवं लययुक्त भाषा में प्रस्तुत करती हैं, जो उनसे छूट चुके हैं। ये कविताएं किसी भी रूप में किसी वयस्क, परिपक्व एवं चिंतनशील व्यक्ति द्वारा रचित होने का अहसास नहीं कराती हैं और यही इन कविताओं की अपनी विशेषता है। बाल मन में प्रवेश कर लिखी गयी इन कविताओं का विषय धर्ती से आकाश तक फैला हुआ है, जहां हरियाली और इन्द्रध्नुष है। यहां इतिहास नहीं, भूगोल और वर्तमान है। सरल, सहज, सुंदर और चमकदार कविताएं। बच्चों का संसार असीमित है। वह इन्द्रधनुष का सतरंगा संसार है। स्वभाविक है इस संसार में कोयल, मैना, तोता, बुलबुल, मोर, पपीहा, मेढक, सियार, बिल्ली, खरगोश, चूहा और हाथी दादा हो। मुनष्य के संसार में जब पशु-पक्षी, प्रकृति, वन-जंगल, गीत-संगीत नहीं हो, तो वह संसार ऊपर से जितना चमकीला दिखाई दे, भीतर से काला और बदरंग होता है।